‘Cold War 2.0’? ट्रंप की जिद, यूरोप की फौज और NATO का अलार्म

साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के रिश्तों में अचानक बर्फीली ठंडक नहीं, बल्कि राजनीतिक आग फैलती दिख रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने की अपनी पुरानी सोच पर एक बार फिर अड़े नज़र आ रहे हैं। दूसरी ओर, यूरोपीय देश इसे सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं बल्कि संप्रभुता और आत्मनिर्णय का सवाल बता रहे हैं।

Trump Strategy: टैरिफ से दबाव, Deal से कब्ज़ा?

ट्रंप प्रशासन ने यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाकर यह साफ संकेत दिया कि ग्रीनलैंड सिर्फ आर्कटिक आइसलैंड नहीं, बल्कि रणनीतिक गोल्डमाइन है। हालांकि, यूरोप ने जवाब में झुकने के बजाय एकजुटता दिखाई।

“जहां ट्रंप डील ढूंढ रहे थे, वहां यूरोप ने डिफेंस प्लान निकाल लिया।”

Europe Reacts: Greenland की सुरक्षा अब Collective Mission

यूरोपीय संघ और NATO के 27 देशों ने ग्रीनलैंड की सैन्य सुरक्षा को लेकर साझा रणनीति की घोषणा की है।

  •  फ्रांस ने Mountain Troops तैनात की
  •  जर्मनी ने Surveillance & Reconnaissance Units भेजीं
  •  डेनमार्क ने Arctic Forces के विस्तार का ऐलान किया
  • नॉर्वे और स्वीडन ने लॉजिस्टिक सपोर्ट बढ़ाया

यह सिर्फ सैन्य कदम नहीं, बल्कि अमेरिका को कूटनीतिक संदेश भी है।

Economy vs Military: क्या यूरोप अमेरिका से ज्यादा ताकतवर?

NATO के कुल सैन्य खर्च में अमेरिका का हिस्सा करीब 42% है, लेकिन संख्या, उद्योग और संयुक्त अर्थव्यवस्था में यूरोप अमेरिका को कड़ी टक्कर देता है।
EU के पास 2023 का Anti-Coercion Instrument है, जिसके तहत वह जवाबी टैरिफ, निवेश रोक और व्यापार प्रतिबंध जैसे हथियार इस्तेमाल कर सकता है।

NATO Article-5: असली Red Line

डेनमार्क ने दो टूक कहा है— “Greenland बिकाऊ नहीं है, उसका भविष्य वहां के लोग तय करेंगे।”

अगर अमेरिका ने सैन्य कदम उठाया, तो डेनमार्क NATO Article-5 लागू कर सकता है। इसका मतलब साफ है— एक सदस्य पर हमला = सभी पर हमला और यहीं से मामला सिर्फ अमेरिका-यूरोप नहीं, बल्कि वैश्विक टकराव बन सकता है।

बर्फ के देश में सबसे गर्म जंग?

ग्रीनलैंड आज सिर्फ आर्कटिक आइलैंड नहीं, बल्कि Global Power Shift का टेस्ट केस बन चुका है। ट्रंप की “America First” सोच और यूरोप की “Collective Security” रणनीति—दोनों आमने-सामने हैं। अब सवाल ये नहीं कि ग्रीनलैंड किसका होगा, सवाल ये है कि दुनिया अगला Cold War कहां देखेगी?

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